बिनाका गीत माला
Saturday, July 5, 2008
विश्व मकड़ जाल पर कुछ ख़ूबसूरत नगमें मिले , सोचा इन को यहाँ डाला जाए
देव आनंद एक उम्दा चरित्रकार थे , जब तक उन्होंने अपनी गर्दन हिलानी शरु नहीं करी थी :-)
यह गीत उन्ही कि फिल्मों से है | मेरा पसंदीदा गीत है " अभी न जाओ छोड़ कर , के दिल अभी भरा नहीं " ।
मुझे देव आनंद "हम दोंनो" फ़िल्म मैं काफ़ी स्मार्ट लग्गे थे । और साधना जी का तो क्या कहना , उन का बालों का अंदाज़ तो दिल फ़ेंक था ।
पर मधुबाला जी कि टक्कर कोई नही कर सकता , माधुरी दीक्षित भी नहीं :-)
चलिए आप गीतों का लुत्फ़ ले , हाँ अगर गीत सुनते समय चाय का प्याला हाथ मैं हो तो फिर आप जन्न्त मैं हैं
मैंने हरिवंश राय बच्चन कि मधुबाला पढ़ ली है । एक कविता का अंश पेश है ।
इस पार प्रिय ,मधु है तुम हो
उस पार ना जाने क्या होगा ।
यह चाँद उदित हो कर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का ,
लहरा लहरा यह शाखायें
कुछ शोक भुला देती मन का ।
कल मुरझाने वाली कलियाँ ,
हंस कर कहती हैं , मग्न रहो |
बुलबुल तरु की फुनगी पर से ,
संदेश सुनाती योवन का |
तुम दे कर मदिरा के प्याले ,
मेरा मन बहला देती हो |
उस पार मुझे बहलाने का ,
उपचार ना जाने क्या होगा |
इस पार प्रिय ,मधु है तुम हो
उस पार ना जाने क्या होगा ।
Posted by :ubuntu at 1:27:00 PM 1 comments
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Words
Sunday, February 3, 2008
I found this शैर in one of my friend's blog. I thought it's worth spreading it.
ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो ,
ज़रा मद्धम करो इस आंच को सोना ।
के जल जाते हैं कुंग्रे नर्म रिश्तों के
ज़रा अल्फाज़ के नाखून ताराशो
बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो ।-गुलज़ार साहब
He goes further to write more , find it here : projectbee
Posted by :ubuntu at 12:23:00 PM 1 comments
Profound Lyrics
Friday, December 28, 2007
In the morning I was watching Izzazat, what a masterpiece.
And is it this what you call profound lyrics:
हलके कोहरे के धुएं मे,
शायद आसमान तक आ गयी हूँ ,
तेरी सूनी बाहों के सहारे,
देखो कहाँ तक आ गयी ।
or is it this :
एक अकेली छतरी मे जब आधे आधे भीग रहे थे,
आधे गीले आधे सूखे सूखा तो मैं ले आई थी ।
गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो ,
वो भिजवादो मेरा कुछ सामान लौटा दो ।
Gulzar has woven magic in this movie. What a poetry
Posted by :ubuntu at 3:13:00 AM 2 comments
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